"चराग़ जलाओ यारों" : अंधकार की छाती पर उजाला उकेरते शब्ददीपों की कहानी
(पुस्तक समीक्षा : नवनाथ आनंदा रणखांबे)
पाली भाषा में बुद्ध ने अपनी गाथाओं, उपदेशों और धम्मवचनों के माध्यम से करुणा, मैत्री, अहिंसा, समानता, स्वपरीक्षण का महत्व, तृष्णा और मोह का त्याग, प्रज्ञा और विवेक का मार्ग दिखाया। उनका मूल संदेश था, "मनुष्य अपने मन को शुद्ध करे, करुणा बढ़ाए, विवेक से जीवन जिए और सबके कल्याण के लिए कार्य करे। "मराठी संत साहित्य में संत ज्ञानेश्वर ने "अवघाची संसार सुखाचा करीन" कहते हुए विश्वकल्याण की भावना जगाई। संत तुकाराम महाराज ने अपने अभंगों से अंधविश्वास, ढोंग और सामाजिक विषमता पर प्रहार कर इंसानियत का धर्म सिखाया। हिंदी साहित्य में संत कबीर ने जात-पात, कर्मकांड और विसंगतियों पर शब्दों की चोट कर सत्य का मार्ग दिखाया। इन महामानवों और संतकवियों ने साहित्य को केवल कला का माध्यम न मानकर समाजप्रबोधन का प्रभावी साधन बनाया। इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए डॉ. गिरीश सूर्यकांत लटकेजी का कविता संग्रह
"चराग़ जलाओ यारों” सामने आता है। यह संग्रह संवेदनशील, सजग और सामाजिक चेतना से युक्त मन का अपने समय से किया गया प्रामाणिक संवाद है। कुछ पुस्तकें केवल पढ़ी जाती हैं, कुछ अनुभव की जाती हैं; लेकिन कुछ पुस्तकें ऐसी होती हैं जो पाठक के मन में स्थायी घर बना लेती हैं। "चराग़ जलाओ यारों” ऐसा ही एक संग्रह, वादलों में भी न बुझने वाला दीप, निराशा के अंधकार में भी आशा की ज्योति और मानवता की राह पर खड़ा साहित्यिक दीपस्तंभ है।
कविताओं की झलक, ----
“करो मन शुद्ध…”
ये नक़ाब नकली है
ज्ञान की बाते झूठी है
ना समझे हम बुद्ध
ना ही मन की गहराई
चलो चले मेरे साथियों वहाँ
ना होगा भास ना आभास जहाँ
सत्य इक मिथ्या है
उस की खोज छोड़ दो
करो अपना मन शुद्ध
वहीं बसा हैं बुद्ध !
खत्म हो जायेगा माया से युद्ध...
उजागर कर लो अपने अंदर का बुद्ध ! (पृष्ठ 15)
डॉ. लटकेजी की इस कविता "करो मन शुद्ध..." में कवि का मानना है कि सत्य की खोज किसी बाहरी प्रतीक, नकाब या कर्मकांड में नहीं, बल्कि मन की निर्मलता में निहित है। कवि बड़े सहज शब्दों में यह संदेश देता है कि जब तक मनुष्य अपने भीतर झाँककर स्वयं को शुद्ध नहीं करता, तब तक ज्ञान की सारी बातें अधूरी हैं। "वहीं बसा हैं बुद्ध" यह पंक्ति कविता का केंद्रीय विचार है, जो आत्मशुद्धि को ही मुक्ति और शांति का मार्ग बताती है। भाषा सरल, प्रवाहपूर्ण और चिंतनपरक है। कविता पाठक को केवल पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि आत्ममंथन के लिए प्रेरित करती है। बाहरी संसार की माया से संघर्ष करने के बजाय अपने भीतर के बुद्ध विचारोंको उजागर करने का संदेश इस कविता को आध्यात्मिक ऊँचाई प्रदान करता है। कम शब्दों में गहरी जीवन-दृष्टि व्यक्त करने वाली यह कविता मनुष्य को आत्मबोध और अंतर्मन की पवित्रता की ओर ले जाने वाली प्रभावशाली रचना है।
कविता "चराग जलाओ यारों..." कविता मे कवि कहता है,......
"यह बुझे चराग फिर जलाओ यारों"
और "ज्ञान दीपक फिर से जलाओ यारों" (पृष्ठ 18)
कवि यहाँ केवल एक दीप जलाने की बात नहीं करता, बल्कि समाज में बुझती संवेदनाओं, खोते मानवीय मूल्यों और विघटित होती सामाजिक चेतना को पुनः प्रज्वलित करने का आव्हान करता है। इस कविता मे कवि मनुष्य को उसकी मूल पहचान इंसानियत की ओर लौटने का संदेश देता है। कवि मानता है कि नफरत की आग को बुझाने और भटके हुए समाज को सही दिशा देने का एकमात्र उपाय ज्ञान, प्रेम और मानवीय मूल्यों का प्रकाश है। "चराग" और "ज्ञान दीपक" यहाँ आशा, विवेक और परिवर्तन के प्रभावी प्रतीक बनकर उभरते हैं। यह रचना अंधकार के विरुद्ध प्रकाश, विभाजन के विरुद्ध मानवता और निराशा के विरुद्ध आशा का सशक्त घोष है।
बस्ती बस्ती… इस कविता मे कवि कहता है ,----
घुट घुट कर जीना छोड़ दिया तुम्हारे आने से
जिंदा हूं महसूस हुआ तुम्हारे सांसों से
भटकता रहा हूं ताउम्र दर्द भुलाने को
मिले राहों में कई हबीब दिल जलाने को
इल्म हुआ जिंदगी का दुख है गहरा सागर से
अब उंगली सुखन की थामे
कट रही है मेरी रातें
समझाने चल पड़ा हूं बस्ती बस्ती
लिए संग तुम्हारे प्यार की मस्ती...
जिंदगी कीमती है और मौत है सस्ती… (पृष्ठ 28)
"घुट-घुट कर जीना छोड़ दिया, तुम्हारे आने से जिंदा हूं"
से आरंभ होने वाली यह कविता, जीवन की पीड़ा, अकेलेपन और निराशा के लंबे सफर को प्रेम की ऊर्जा से जोड़ते हुए आशा और सकारात्मकता का सुंदर चित्र खडा करता है।
"भटकता रहा हूं ताउम्र दर्द भुलाने को"
तथा
"इल्म हुआ जिंदगी का दुख है गहरा सागर से"
जैसी पंक्तियाँ जीवन के कटु अनुभवों और मनुष्य की आंतरिक वेदना को गहराई से व्यक्त करती हैं। कवि स्वीकार करता है कि जीवन दुखों से भरा है, किंतु प्रेम, संवेदना और साथ का स्पर्श उसे जीने की नई वजह देता है। यहाँ प्रेम केवल किसी व्यक्ति के प्रति आकर्षण नहीं, बल्कि जीवन को अर्थ देने वाली शक्ति के रूप में सामने आता है। कविता की सबसे प्रभावशाली पंक्ति
"जिंदगी कीमती है और मौत है सस्ती"
जीवन-दर्शन का सार प्रस्तुत करती है। कवि जीवन के महत्व को रेखांकित करते हुए उसे सार्थक बनाने का संदेश देता है। वहीं,
"बस्ती बस्ती लिए संग तुम्हारे प्यार की मस्ती"
पंक्ति प्रेम के सार्वभौमिक और मानवीय स्वरूप को व्यक्त करती है, जो व्यक्ति को स्वयं तक सीमित न रखकर समाज से जोड़ती है। सरल, सहज और भावनात्मक भाषा में लिखी गई यह कविता प्रेम को जीवन की उपचारक शक्ति के रूप में स्थापित करती है। दर्द से गुजरकर आशा तक पहुँचने की यह यात्रा पाठक के मन को स्पर्श करती है और उसे जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाने की प्रेरणा देती है।
एहसास करों… इस कविता मे कवी कहते है, …..
खुदा नहीं, ना है ईश्वर
ढूंढा हमने जिसे उम्र भर
जिंदगी गुजर रही है
वक्त के पहाड़ के परे जा रही है
इक कहानी हमारे दरमियां खड़ी है
जो जिंदगी भर हम से लड़ी है
बया करो इस कहानी को,
समझो वक्त की तंगदिली को...
पहाड़ की नीव ढह रही है!
प्यास कायम रख्खों जीने की
सुर, साथ, सरगम की !
दूर हो या पास हो
एहसास करों के सांस हैं...
(पृष्ठ 35)
उपरोक्त पंक्तियों में,
"खुदा नहीं, ना है ईश्वर, ढूंढा हमने जिसे उम्र भर"
से आरंभ होने वाली यह कविता मनुष्य के अस्तित्व, जीवन-संघर्ष और आत्मबोध की गहन पड़ताल करती है। कवि बाहरी आस्था और ईश्वर की खोज से आगे बढ़कर जीवन के वास्तविक अनुभवों और मानवीय संवेदनाओं को समझने का संदेश देता है।
"जिंदगी गुजर रही है, वक्त के पहाड़ के परे जा रही है"
तथा
"इक कहानी हमारे दरमियां खड़ी है, जो जिंदगी भर हम से लड़ी है"
जैसी पंक्तियाँ जीवन की जटिलताओं, संघर्षों और समय की कठोरता को प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त करती हैं। अंतिम पंक्ति
"दूर हो या पास हो एहसास करो के सांस हैं"
कविता को एक दार्शनिक ऊँचाई प्रदान करती है। यह पंक्ति बताती है कि जीवन का सबसे बड़ा सत्य संबंधों, संवेदनाओं और जीवंत एहसासों में छिपा है।
सरल किंतु चिंतनशील भाषा में लिखी गई यह कविता है l
जीवन-सत्य और संवेदनाओं के महत्व को रेखांकित करती है, जो इसकी सबसे बड़ी विशेषता है। कवि बाहरी आस्था से आगे बढ़कर जीवन के वास्तविक अनुभवों और मानवीय संवेदनाओं को समझने का संदेश देता है।
"दूर हो या पास हो एहसास करो के सांस हैं"
यह पंक्ति कविता को दार्शनिक ऊँचाई देती है।
"ये नादान इंसान", "नैया", "हसीन कड़ी", "मेरे अज़ीज़", "मायूस ना हो" आदि कविताएँ अत्यंत प्रभावशाली और हृदयस्पर्शी हैं। इस पुस्तक की सभी कविताएँ भाव, विचार और संवेदनाओं से परिपूर्ण हैं। कवि ने सरल, सहज और प्रभावी भाषा के माध्यम से जीवन, प्रेम, संघर्ष, मानवता और आशा के विविध रंगों को अभिव्यक्त किया है। यह कविता-संग्रह पाठक को आनंद देकर चिंतन करने के लिए भी प्रेरित करता है।”
संग्रह की विशेषताएँकविताएँ कल्पनारम्य नहीं, बल्कि समाज के यथार्थ से सीधा संवाद करती हैं। राजनीतिक स्वार्थ, सामाजिक विषमता, नैतिक पतन और संवेदनाओं के अभाव पर कवि तीखा लेकिन रचनात्मक स्वर उठाता है। भाषा सरल, प्रवाहपूर्ण और जनसामान्य से जुड़ी हुई है। कविताओं में आक्रोश है, पर वह विध्वंस का नहीं; विद्रोह है, पर वह द्वेष का नहीं; करुणा है, पर वह निष्क्रिय नहीं।
“चराग़ जलाओ यारों" संग्रह समय के माथे पर उजाले की लकीरें खींचने का प्रयास है। यह निराशा के रेगिस्तान में आशा का पौधा है, अन्याय के अंधकार से लड़ने वाली मशाल है और सबसे महत्वपूर्ण —
मानवता पर विश्वास बनाए रखने वाला साहित्यिक दस्तावेज हैl
विवरण पुस्तक : चराग़ जलाओ यारों
कवि : डॉ. गिरीश सूर्यकांत लटके
पृष्ठ संख्या : 46
मूल्य : ₹80
प्रकाशन : मैत्री पब्लिकेशन
पुस्तक समीक्षा : जीवनसंघर्षकार नवनाथजी रणखांबे
(लेखक / कवि / समीक्षक — अंतरराष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय वर्ल्ड बुक ऑफ रिकॉर्ड्स धारक तथा विविध पुरस्कारों से सम्मानित)



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